न कालस्यास्ति बन्धुत्वं
न हेतुर्न पराक्रमः ।
न मित्रज्ञातिसम्बन्धः
कारणं नात्मनो वशः ।।
वाल्मीकि रामायण, किष्कि., २५/७
अर्थात् —-
काल का किसी के साथ बन्धुत्व, मित्रता अथवा जाति बिरादरी का सम्बन्ध नहीं है । उसे वश में करने का कोई उपाय भी नहीं है तथा उस पर किसी का पराक्रम नही चल सकता । कारणस्वरूप काल जीव के भी वश में नहीं है ।।
इसलिए काल अर्थात समय को अनावश्यक ना जाने दें । सदैव अपने को व्यस्त रखें कुछ ना कुछ करते रहें ।।
‘ !! आध्यात्मिक मार्ग के सूत्र !!
*किं व्रतेन तपोभिर्वा*
*दम्भश्चेन्न निराकृत:।*
*क्रियादर्शेन किं दीपै:*
*यद्यान्ध्यं न दृशोर्गतम् ।।*
अध्यात्मसार -०३/०४
अर्थात् —–
यदि दंभ को समाप्त नहीं किया तो व्रत एवं तपस्या से कोई लाभ उसी प्रकार नहीं होता जैसे कि, आंखों के अन्धापन को समाप्त किए बिना दर्पण एवं दीपक से कोई लाभ नही होता ।।
इसलिए निरंतर अपने भीतर के दुर्गुणों को दूर करते हुए सद्गुणों को अपनायें ।। स्वयं भी प्रसन्न रहें और समाज को भी प्रसन्न करते रहें ।।
हरिकृपा ।।
मंगल कामना ।।










