
25 फरवरी 2024, रविवार कृष्ण पक्ष का वह काला दिन,
जब आप हमें छोड़कर अनंत यात्रा पर बिना कुछ कहे निकल गए थे।
जीवन का वह क्षण, जिसे चाहकर भी कभी भुलाया नहीं जा सकता,
मेरी आँखों के सामने ही आप क्रूर काल के गाल में समा गए थे।
वह दिन अब कभी लौटकर नहीं आएगा,
जब आपकी राह देखते हुए मेरा हर पल बीतता था।
आपके घर आते ही मानो पूरे आँगन में,
खुशियों का एक नया और अनोखा सूरज खिल उठता था।
आज भी दरवाज़े पर कोई आहट सुनकर दिल ठहर-सा जाता है,
मानो आप मुस्कुराते हुए अभी सामने आ जाएँगे।
पर अगले ही पल यह कठोर सत्य स्मरण हो आता है,
कि अब आप केवल हमारी स्मृतियों में ही मिल पाएँगे।
आपका स्नेह, आपका मार्गदर्शन, आपकी सीख और आपका साया –
आज भी मेरे जीवन का सबसे बड़ा संबल हैं।
आप भले ही इस नश्वर संसार से अनंत दूर चले गए हों,
किन्तु आपकी उपस्थिति मेरे हर विचार, हर निर्णय और हर कर्म में समाहित है।
पापा, आपकी कमी को कोई शब्द व्यक्त नहीं कर सकते।
जीवन की हर खुशी में एक अधूरापन-सा महसूस होता है।
फिर भी आपके दिए संस्कार, आपका आशीर्वाद और आपकी प्रेरणा,
मुझे हर कठिन राह पर आगे बढ़ने का साहस प्रदान करते हैं।
समय का प्रवाह निरंतर आगे बढ़ रहा है;
देखते-ही-देखते दो वर्ष बीत गए और तीसरा वर्ष आरम्भ हो गया है।
किन्तु आपकी स्मृतियाँ आज भी उतनी ही ताज़ा हैं,
जितनी उस दिन थीं, जब आपने हमें अंतिम बार देखा था।
आप मेरे लिए केवल एक पिता ही नहीं थे,
आप मेरा अभिमान, मेरी शक्ति और मेरे जीवन की सबसे अनमोल पूँजी थे।
आपके व्यक्तित्व की ऊष्मा, आपके प्रेम की छाया और आपके शब्दों की गूँज,
आज भी मेरे जीवन-पथ को आलोकित करती है।
जब भी जीवन की राह कठिन होती है,
आपकी सीख मेरा मार्गदर्शन बन जाती है।
जब भी मन निराश होता है,
आपकी स्मृतियाँ संबल बनकर मुझे संभाल लेती हैं।
आप भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं,
किन्तु आपका आदर्श, आपका त्याग और आपका स्नेह,
हमारे जीवन का अमूल्य धरोहर बनकर सदैव हमारे साथ रहेगा।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आपकी पावन आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा हमें आपके आदर्शों पर चलने की शक्ति प्रदान करें।
पापा, आप भले ही दृष्टि से दूर हों, पर हमारे हृदय में सदैव जीवित रहेंगे।
“पिता कभी विदा नहीं होते वे अपने बच्चों के विचारों,
संस्कारों और स्मृतियों में सदैव जीवित रहते हैं।”
रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार













