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वीर योद्धा

उसके जीवन का आज अंतिम दिन था
पर उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी
आज वह शूली पर चढ़ने जा रहा था
उसके हाथ पैर में जंजीरें कसी थी
आँख पर काली पट्टी बांधी थी
पूरे दस जवान जंजीरों को पकड़े थे
फिर भी वह जिधर हिल जाता
उधर ज़लज़ला आ जाता
आखिरकार उसे उस मैदान में लाया गया
जहाँ सूली लगी हुई थी
पूरा पांडाल खचाखच भरा हुआ था
कहीं तिल रखने की जगह भी नहीं थी
उसी बीचो बीच मैदान में उसे लाकर
खडा कर दिया गया
और सूली चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो गई
लोग तालियां बजा रहे थे
तभी शोर थम गया
क्यों की बादशाह आ गए
उसके सजा की मुनादी होने ही जा रही थी कि
कहीं से आवाज़ आई
महाराज आप के अपराधी के पास
एक बहुत अच्छा गुड है उसे देख लो
बादशाह ने कहा ठीक दिखाओ
आवाज़ आई
इसे एक तीर और एक धनुष दिया जाए
यह शब्दवेदी वान चलाता है
सब लोग देखना चाहते थे
इस लिए धनुष वाण दिया गया
तभी एक स्वर और उभरा
चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥
एक तीर चलता है
मुहम्मद गोरी की छाती को भेद कर
उसे वहीं ढेर कर देता है
इधर चन्द्र बरदाई ने
पृथ्वीराज के सीने में
खंजर उतारे हुए उससे क्षमा मांगता
पूरा पांडाल हतप्रद होकर
तीनों को देखता रह जाता है

महेंद्र कुमार मधुकर

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