
कुछ लोग जीवन की लंबाई से नहीं, बल्कि अपने कर्मों और संघर्षों से पहचाने जाते हैं। वे समय की धारा में भले ही अल्पकाल के लिए उपस्थित हों, लेकिन अपने पीछे ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जो वर्षों तक समाज की स्मृतियों में जीवित रहती है। भोजपुर जिले के बिलौटी गाँव के युवा सामाजिक कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिनका जीवन संघर्ष, संवेदना और जनसरोकारों के प्रति समर्पण का प्रतीक बन गया। ग्रामीण मिट्टी में जन्मे भरत भूषण तिवारी ने बचपन से ही अभाव, पीड़ा और संघर्ष को करीब से देखा था। गंगा के कटाव से उजड़ते घर, बाढ़ की विभीषिका से टूटते सपने और विस्थापन की त्रासदी झेलते परिवार उनके लिए केवल समाचार नहीं थे, बल्कि वे चेहरे थे जिनकी आँखों में उन्होंने बेबसी और उम्मीद दोनों को देखा था। यही अनुभव उनके व्यक्तित्व की आधारशिला बने और उन्होंने समाज के वंचित, पीड़ित और उपेक्षित लोगों की आवाज़ बनने का संकल्प लिया। भरत भूषण तिवारी उन युवाओं में थे जो केवल समस्याओं पर चर्चा नहीं करते, बल्कि उनके समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने का साहस भी रखते हैं। प्रशासनिक उदासीनता हो, भ्रष्टाचार का प्रश्न हो, बेरोजगारी की पीड़ा हो या कटाव पीड़ितों की समस्या—उन्होंने हर मुद्दे को अपनी जिम्मेदारी समझकर उठाया। वे लोगों की शिकायतों को अधिकारियों तक पहुँचाते, जनहित के मुद्दों पर आवाज़ बुलंद करते और समाज के उन वर्गों के साथ खड़े दिखाई देते थे जिनकी आवाज़ अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँच पाती। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी संवेदनशीलता थी। वे केवल एक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि लोगों के सुख-दुःख के सहभागी थे। गाँव के बुजुर्गों की समस्याएँ हों, महिलाओं की पीड़ा हो या विस्थापित परिवारों का संघर्ष – वे हर किसी की बात गंभीरता से सुनते थे। शायद यही कारण था कि बहुत कम समय में उन्होंने लोगों के बीच विश्वास और सम्मान का एक विशेष स्थान बना लिया। कोरोना महामारी के कठिन दौर में भी उनकी सामाजिक चेतना दिखाई दी। मानवता की सेवा के लिए उन्होंने वैक्सीन परीक्षण में स्वयं को प्रस्तुत करने की इच्छा व्यक्त की थी। यह केवल एक साहसिक निर्णय नहीं था, बल्कि समाज और देश के प्रति उनके समर्पण का प्रमाण भी था। वे मानते थे कि यदि किसी व्यक्ति का छोटा-सा योगदान भी जनकल्याण में सहायक हो सकता है, तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए। 17 जून 2026 को उनकी जीवन-यात्रा एक ऐसे मोड़ पर समाप्त हुई जिसने पूरे बिहार को झकझोर दिया। पुलिस और एसटीएफ के साथ हुई एक कथित मुठभेड़ में उन्हें गोली लगी और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने अनेक प्रश्नों को जन्म दिया। उनके परिजनों, समर्थकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने निष्पक्ष जाँच की मांग की, जबकि प्रशासन ने अपनी कार्रवाई को उचित बताया। देखते ही देखते यह घटना राज्य और देश की चर्चाओं का विषय बन गई। मृत्यु के बाद भी भरत भूषण तिवारी चर्चा के केंद्र में बने रहे। उनकी जीवन-यात्रा ने यह प्रश्न समाज के सामने छोड़ दिया कि जनहित के मुद्दों पर संघर्ष करने वाले युवाओं की भूमिका क्या होनी चाहिए, और लोकतंत्र में असहमति तथा जनआवाज़ों को किस प्रकार सुना जाना चाहिए। भरत भूषण तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ, उनके संघर्ष और उनके सपने आज भी जीवित हैं। वे उन असंख्य लोगों के दिलों में बसे हुए हैं जिनके लिए उन्होंने आवाज़ उठाई, जिनके दुःख को अपना दुःख माना और जिनकी उम्मीदों को अपना उद्देश्य बनाया। समय बीत जाएगा, घटनाएँ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएँगी, लेकिन समाज के लिए संघर्ष करने वाले ऐसे युवाओं की कहानियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं। भरत भूषण तिवारी की कहानी भी एक ऐसी ही कहानी है एक अधूरी लड़ाई की, एक अडिग विश्वास की और जनसरोकारों के प्रति समर्पित एक युवा योद्धा की। उनकी स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी याद में साहित्यिक काव्य –
तुम चले गए, मगर सवाल छोड़ गए,
हर दिल में कुछ मलाल छोड़ गए।
जो आवाज़ बनी थी बेबस लोगों की,
वह गूँजता हुआ ख्याल छोड़ गए।
गाँव की पगडंडी, खेतों की मेड़,
आज भी तुम्हें पुकारती होगी,
कटाव से उजड़े उन आशियानों में,
तुम्हारी याद संवारती होगी।
तुमने दर्द को अपना दर्द समझा,
हर आँसू की भाषा पढ़ी थी,
सत्ता के बंद दरवाज़ों तक भी,
जनता की आवाज़ पहुँचाई थी।
तुमने देखा था टूटते सपनों को,
बाढ़ में बहती उम्मीदों को,
और ठान लिया था लड़ना होगा,
अन्याय की हर एक दीवारों को।
तुम्हारे हाथों में कोई शस्त्र नहीं था,
बस सच की मशाल जलती थी,
जनहित की राहों पर चलने की,
एक जिद तुम्हारे भीतर पलती थी।
आज भले ही तुम हमारे बीच नहीं,
पर संघर्ष तुम्हारा जीवित है,
हर उस दिल में जो न्याय चाहे,
तुम्हारा सपना अभी सुरक्षित है।
समय की धूल बहुत कुछ ढँक देगी,
पर इतिहास तुम्हें भुला न पाएगा,
जन-जन की पीड़ा का वह साथी,
युगों तक याद किया जाएगा।
हे युवा योद्धा! तुम्हें नमन है,
तुम्हारे साहस को प्रणाम है,
जनसरोकारों की इस धरती पर,
तुम्हारा नाम सदा अविराम है।
तुम गए नहीं, तुम जीवित हो,
हर संघर्षरत इंसान में,
हर उस आवाज़ की धड़कन में,
जो उठती है स्वाभिमान में।
विनम्र श्रद्धांजलि
भरत भूषण तिवारी की पावन स्मृति को समर्पित।
रूपेश कुमार
युवा साहित्यकार
चैनपुर, सीवान (बिहार)













