
सोचों जरा कि वो भी, क्या पल रहा होगा ।
धूप में जिसने, थोड़ी छांव कर दिया था यहां ।
अब जो गालों पर, यूं बह कर तेरे बिखरा हैं,
पहले तुम्हारे आंख का,काजल रहा होगा।
टूट के देखो,आज कल, पड़ा हैं कोने में।
पहले तुम्हारे पांव का,पायल रहा होगा।
दिल के ज़ख्मों को,जो सी रहा था वहां।
वो भी तुम्हारे इश्क का, घायल रहा होगा।
नाम – लेखिका जयश्री पाण्डेय
पता – छपरा ( बिहार)













