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एक अनकही नोक-झोंक

बदलने लगा है मिज़ाज-ए-जीवन,
तेरे आने की बस एक आहट सुन के।
तकरार में भी मचलती है धड़कन,
ताने-बाने बुनती है ये रात चाहत के।।

ये जो चलती है हमारे बीच,
एक अनकही सी नोक-झोंक हर घड़ी।
ये तकरार नहीं, बस वो डोर है,
जिससे मोहब्बत की हर साँस जुड़ी।।

इन्हीं ख़ामोश शिकवा-शिकायतों से मिलकर,
बुना है रूह ने यादों का ये ताना-बाना।
तेरा वो जता कर हक़ मुझे डाँटना,
और मेरा चुपके से तेरी परवाह में ढल जाना।।

अंदाज़ क्या बयां करूं इस बेख़ुदी का,
कि अब दुनिया के तराज़ू में हमें क्या तौलना।
जहाँ लफ़्ज़ कम पड़ जाएं एक-दूसरे के आगे,
वहाँ चुप रहकर भी सब कुछ समझ लेना।।

मुझे नाज़ है अपनी इस पाकीज़ा मोहब्बत पर,
कि तुम मेरी तक़दीर का सबसे मुकम्मल हिस्सा हो।
लिख दिया है मैंने अपनी रूह के पन्नों पर,
कि तुम ही मेरी बंदगी, तुम ही मेरा किस्सा हो।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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