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मुक्तक

ये शौक से उड़ाते हो सिगरेट का धुँआ,
ये शौक का नहीं, शोक का धुआं है।

तुम यूं ही उड़ाते हो अपने मां-बाप की दौलत,
ये बेशर्मी,बेहयाई,जलालत का धुँआ है।

पता नहीं? तुम स्वयं, मौत को दे रहे दावत,
थाम ली सिगरेट, कलम की जगह हाथों में,

उड़ा दी अय्यासी में जो मेहनत की माँ बाप की कमाई,
यह सिगरेट का नहीं तुम्हारी
ख्यायशों की बर्बादी का धुँआ है।।

भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश

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