
मैं मंदिर की घंटी हूँ, मस्जिद की अज़ान हूँ,
गुरुद्वारे का लंगर हूँ, गिरजाघर की प्रार्थना हूँ।
मेरी रंगों में गंगा-यमुना का पानी बहता है,
मैं पत्थर नहीं, जीता-जागता इंसान हूँ।
मैं किसानों के पसीने की खुशबू हूँ,
सरहद पर खड़े जवान का जूनून हूँ।
मैं बेटियों की हँसी में बसने वाला कल हूँ,
बूढ़ी आँखों के सपने का सम्बल हूँ।
मुझे बाँटने की कोशिश हज़ार हुई,
मगर मैं टूटा नहीं, हर बार जुड़ा हूँ।
मेरा मज़हब तिरंगा, मेरी जात इंसान,
मैं राम भी हूँ, मैं रहमान भी हूँ।
जब-जब नफ़रत की आँधी चली है,
मैं मोहब्बत का दीप बनकर जला हूँ।
सुन लो दुनिया वालों, कान खोलकर,
मैं मिटने वाला नहीं, मैं हिंदुस्तान हूँ।
मैं बुद्ध की करुणा हूँ, महावीर का त्याग हूँ,
नानक की वाणी हूँ, कबीर का राग हूँ।
मेरे आँगन में तुलसी भी महकती है,
और रहीम के दोहे भी गूँजते हैं।
मैं ताज का संगमरमर हूँ, कोणार्क का पहिया हूँ,
खजुराहो की कला हूँ, अजंता की तूलिका हूँ।
मेरे सीने में वेद भी बसते हैं,
और कुरान की आयतें भी पलती हैं।
मैं शहीदों की चिता की राख हूँ,
भगत, आज़ाद, बिस्मिल की साख हूँ।
मैं कलम का सिपाही, हल का साथी,
हर बच्चे की आँखों का सपना हूँ।
मुझे आग में जलाओगे तो सोना बनूँगा,
तूफ़ान में उड़ाओगे तो और बुलंद हो जाऊँगा।
मैं वो दरिया हूँ जो सबको समेट लेता है,
नफ़रत के पत्थर भी मुझमें घुल जाते हैं।
सुनो, मैं कोई नारा नहीं जो मिट जाए,
मैं वो संकल्प हूँ जो युगों तक जाए।
जब तक सूरज-चाँद रहेगा आसमान में,
तब तक अमर रहेगा अपना हिंदुस्तान।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













