
जब जीवन की राहों पर मैं,
अपनी ही धुन में चलता था।
सपनों की रंगीन गलियों में,
हर पल हँसता, हर पल पलता था।
न जाने कब संघर्षों के,
पत्थर राहों में आ टकराए।
मेरे कोमल कदम डगमगाए,
सारे सपने जैसे घबराए।
मैं गिरने ही वाला था,
तब अपनों ने हाथ बढ़ाया।
उनके स्नेह और विश्वास ने,
जीवन जीना फिर सिखलाया।
मैं आगे बढ़ता जाता था,
हर मुश्किल को अपनाता था।
तभी सामने एक विशाल शिला,
मुझको ललकारने आता था।
मैंने सोचा, किसी सहारे से,
इस संकट से बच जाऊँगा।
पर पीछे जब मुड़कर देखा,
तो बिल्कुल तनहा पाऊँगा।
दूर-दूर तक कोई न अपना,
जिसको अपना दर्द सुनाऊँ।
ज़ोर-ज़ोर से सबको पुकारा,
किसको अपना हाल बताऊँ?
खून के रिश्तों को भी मैंने,
आँसू भरकर आवाज़ लगाई।
लेकिन मेरी सूनी राहों में,
कोई भी मदद को न आया भाई।
वह पत्थर मुझसे टकराया,
तन पर गहरे घाव दे गया।
दर्द की काली रात बिछाकर,
मुझसे मेरी मुस्कान ले गया।
मैंने समाज से समय भी माँगा,
ज़ख्मों पर थोड़ा मरहम माँगा।
अपने तो मरहम लेकर आए,
पर समाज ने नमक ही छिड़क डाला।
मैं रोया भी, मैं टूट भी गया,
पर हिम्मत फिर भी हार न पाया।
संघर्षों की उस कठिन डगर पर,
मैंने कदम बढ़ाना न छोड़ा
Suyash Agnihotri













