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दुनियाँ

बहुत बड़ी ये दुनियाँ है तेरी प्रभु दूर तलक इंसानों की भीड़ ही भीड़ नज़र आती है
इस भीड़ मे मेरा कौन है या मैं किसका हूँ क्यों आज भी समझ से परे हो जाती है

दुनियाँ बनाने मे कोई कमी ना की तुने ए रब एक हमदम मे ही क्यों कंजूसी दिखा गया
क्या नुक्स तुने नसीब मे मेरे ए मालिक पाया कि इस इंसानों के रैले मे मुझे ही तन्हा बना गया

जीवन दिया दर्द दिया जो दिया खूब दिया पर बांटनेवाला ना दिया
क्या कमी थी मेरे नशेमन मे हे खुदा जो खाली पिटारा मुझे ही पकड़ा दिया

बड़ी ही तंगदिल नियत तेरी थी ए मेरे हुजूर मांगने का वजूद ही मिटा दिया
कश्ती मेरी भरे मंझधार मे बिन साहिल ही उतार दिया

अब शिकवा शिकायत का कोई लफ्ज़ ही मेरे इख्तियार मे नाकाबिल-ए-सुरत है
दिल मे मेरे अब तेरे बिन ही अन्धेरी गुमनामी की काली श्याह मूरत है

क्या और लिखूँ धरती आसमान के बीच डोल रहे है
बिन किनारों के ही बहती धाराओं मे बहे रहे है।


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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