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माँ का भरोसा

रिश्तों में जब भरोसा होता है,
जीवन और भी सुंदर होता है।
कितने ही विषधर पलते हैं यहाँ,
मन भी तो एक बाँह जैसा होता है।
मैं यदि कह भी दूँ “सब ठीक है,”
माँ को फिर भी भरोसा नहीं होता है।

झूठ का जीवन लंबा नहीं होता,
सच का ही सदा विश्वास होता है।
मित्रता में छल करने वाले,
कभी किसी के अपने नहीं होते हैं।

आँख की नमी पहचान लेती है,
माँ से कुछ भी छुपा नहीं होता है।
बेटा हँसकर पीड़ा छुपाए,
माँ का मन फिर भी खुला होता है।

संदेह की दीवार गिरा दो अमन,
तभी घर भी सुहावना होता है।
नहीं तो रिश्ते कागज़ जैसे,
थोड़ी-सी आँच में भस्म होते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर, नागपुर (महाराष्ट्र)

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