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अनेकता में एकता

फुल कभी खिलते नहीं , कलियां हि खिलतीं है

सूरते तो मिलती नहीं,
भावनाएं हि मिलती है।

सपनों को साकार करने में
सफलता जरूर मिलती है ।

परिधानों के रंग रुप अनेक
पर कलाकारी तो मिलती जुलती है।

भाषाएं अनेकों अनेक है यहां की पर
देश भगति तो मिलती है।

पग पग पर पानी का स्वाद अलग अलग,
पर प्यास सभी यहिं बुझती है।

भांति भांति कि तरकारी भोजन यहां
पर,
भुख सभी की एक सी है,
और भुख सभी की मिटती है।

कविता रस अनेकों अनेक,
पर कवि भाव में कविताऐं मिलती जुलती है।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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