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चरित्र का बागी

विधा : पद्य

जो जाग जाग सोते हैं , अंदर के बुरे वे होते हैं ।
अंदर के बुरे जो होते हैं , निज जीवन काॅंटे बोते हैं ।।
निज जीवन काॅंटे बोते हैं , अच्छे दिन वे खोते हैं ।
अच्छे दिन जो खोते हैं , पीठ पर वे मैला ढोते हैं ।।
पीठ पर मैला जो ढोते हैं , निज भाग्य वे डुबोते हैं ।
निज भाग्य जो डुबोते हैं , दुर्भाग्य का खेत जोते हैं ।।
दुर्भाग्य का खेत जोते हैं , दुर्दिन का बीज वे बोते हैं ।
दुर्दिन का बीज बोते हैं , धुले दाग निज धोते हैं ।।
धुले दाग निज धोते हैं , क‌ई दाग जीवन में ढोते हैं ।
क‌ई दाग जीवन ढोते हैं , वे पलकें कब भींगोते हैं ।।


अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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