
विधा : पद्
इंद्र जगे देख बादल जागा ,
बादल देख जागा बयार ।
चला बयार बादल धकेल ,
जहाॅं था बयार को प्यार ।।
चीखे चिल्लाए गरजे घन ,
बिजली तड़के चमकाए ।
बयार करे घन को बेआड़ ,
मनमर्जी घन को पहुॅंचाय ।।
इंद्र के जगते घन जागा ,
जब से चढ़ा ये आषाढ़ ।
वर्षा ओले खूब हैं गिरे ,
नदियों में आ गई बाढ़ ।।
घन जगते नदियाॅं जागीं ,
चलीं नदियाॅं ले उफान ।
नदियाॅं चढ़ीं हाथी कंधे ,
बढ़ चली है सीना तान ।।
नदियों में है प्लावनता ,
तीनों के मिले सुर लय ।
बिजली घन वर्षा नदियाॅं ,
मचाने लगीं जल प्रलय ।।
यत्र तत्र हो रही तबाही ,
मचने लगी चीख पुकार ।
धन जन घर हुई है क्षति ,
बचे हुए का गया आहार ।।
आहार गया आधार गया ,
हो गए मानव बड़े बेआड़ ।
दैव को जैसे हो दया नहीं ,
कर रहा मानव चीत्कार ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













