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कुछ तुम भी लिखो, कुछ मैं लिखता हूँ

कुछ तुम भी लिखो, कुछ मैं लिखता हूँ,
तुम उदासी लिखो, मैं प्यार लिखता हूँ।

ग़म के आईने में यूँ न झाँका करो,
तुम आँसू लिखो, मैं जज़्बात लिखता हूँ।

यादों की राहों में रातें कैसे कटीं,
तुम तन्हाई लिखो, मैं दिल की बात लिखता हूँ।

इतने दिनों तक दिल तड़पा तो होगा,
तुम आशिकी लिखो, मैं बीती रात लिखता हूँ।

बिन तेरे सूनी रहीं मेरी बाँहें,
तुम सुबह की लिखो, शाम की मैं लिखता हूँ।

सुलगती थीं साँसें, तरसती थीं आँखें,
कसक तुम भी लिखो, तड़प मैं लिखता हूँ।

चाह दोनों की थी, तड़प दोनों की थी,
कुछ शेर तुम भी लिखो, कुछ मैं लिखता हूँ।

मिलन की आस में, गुज़रता गया पल,
तुम इंतज़ार लिखो, मैं मुलाक़ात लिखता हूँ।

जो लफ़्ज़ अधूरे थे तेरे होंठों पर,
तुम ख़ामोशी लिखो, मैं अल्फ़ाज़ लिखता हूँ।

चाँद भी रोया था, तेरी जुदाई में,
तुम चाँदनी लिखो, मैं बरसात लिखता हूँ।

लब ख़ामोश रहे, आँखें सब कह गईं,
तुम ख़ामोशी लिखो, मैं अल्फ़ाज़ लिखता हूँ।

धड़कनों ने हर पल, तेरा नाम लिया,
तुम धड़कन लिखो, मैं एहसास लिखता हूँ।

रवि, इश्क़ की दास्ताँ यूँ ही चलती रहे,
तुम मुस्कान लिखो, मैं संसार लिखता हूँ।

रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड

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