
खुद को काबिल कभी नहीं देखा
और किसी को कातिल कभी नहीं देखा
मैंने देखे हैं उसके घाव,
उसके कंधे का तिल नहीं देखा
वो चुप होती थी तो लगता था
सारी दुनिया की उदासी उसमें है
वो हंसती थी तो लगता था
गम भी एक पल को मुस्कुरा गया है
मैंने सुनी हैं उसकी सिसकियां,
पर उसकी हंसी की आवाज नहीं सुनी
रात भर जागकर जो सबके लिए दुआ मांगे,
सुबह उसकी आंखों में वो चमक देखी
पर प्यार में इतना अंधा था मैं,
उसके माथे की बिंदी तक नहीं देखी
लोग कहते हैं प्यार में चेहरा जरूरी है,
मैंने कहा प्यार में एहसास जरूरी है
सूरत क्या होती है मोहब्बत की,
ये दिखावे का चलन नहीं देखा
हमारा रिश्ता दिल से था,
कोई कागज की शर्त नहीं थी
इसलिए मैंने उसकी रूह को छुआ,
उसके शरीर का रंग नहीं देखा
आज लोग पूछते हैं कैसी थी वो,
मैं कहता हूं जैसी भी थी अपनी थी
जिसने रूह से रिश्ता जोड़ा हो,
उसे जिस्म की जरूरत नहीं होती
सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचनाएँ
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि, व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर, नागपुर (महाराष्ट्र)













