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मतलब का संसार

ये मतलब का संसार रे मानव ,
ये मतलब का संसार ।
तू भी उसी का यार रे मानव ,
ये मतलब का संसार ।।
क्या सोच तू आया नीचे ,
नित्य जगे अंखिया मीचे ।
सजाना तो था ये उद्यान ,
बना डाला इसे तू कीचे ।।
किससे करना था प्यार रे मानव ,
किससे कर डाला प्यार ।
ये मतलब का संसार रे मानव ,
ये मतलब का संसार ।।
कहाॅं कहाॅं से माल मंगाया ,
सबको मिला मिट्टी बनाया ।
गूॅंथ गूॅंथ तैयार किया तुझे ,
आत्मासन दे तुझे रचाया ।।
क्या करना था स्वीकार रे मानव ,
किसे किया तू स्वीकार ।
ये मतलब का संसार रे मानव
ये मतलब का संसार ।

शब्दार्थ : कीचे = कीचड़

पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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