
कबीरा कहे पुकार के, सुधर जाओ रे इंसान,
समय बड़ा बलवान है, मिट जाएगा अभिमान।
आज जो ऊँचा उड़ रहे, कल धूल में मिल जाएँ,
कर्मों का हिसाब होगा, किससे बचकर जाएँ?
धन-दौलत और मान-सम्मान, सब यहीं रह जाएगा,
अंत समय में इंसान, अपने कर्मों को पाएगा।
कबीरा कहे पुकार के, सुधर जाओ रे इंसान,
समय बड़ा बलवान है, मिट जाएगा अभिमान।
पनघट पर बैठी गोरी
पनघट पर बैठी गोरी, निहारे तिहारी राह,
कब आओगे साँवरे श्याम, कैसे बुझेगी प्यास?
घट में जल है, नैनों में नीर,
मन में बस तेरा ही नाम।
तेरी राह निहारूँ मोहन,
तू ही मेरा साँवरा श्याम।
बाँसुरी की धुन सुनने को,
तरसे ये अधरों की आस।
पनघट पर बैठी गोरी,
कब आओगे साँवरे पास?
रहिमन वो गुज़र गए
रहिमन वो गुज़र गए, जो थे तेरे पास,
अब किससे कहें दिल की, कौन समझे मन की आस?
वक़्त की इस राह में, सब चलते हैं साथ,
कुछ दूर तलक मिलते हैं, फिर छूट जाता हाथ।
जो कल तक थे अपने, आज बन गए अजनबी,
यादें रह गईं पास, मगर दूर हो गई ज़िंदगी।
रहिमन वो गुज़र गए, जो थे तेरे पास,
अब किससे कहें दिल की, कौन समझे मन की आस।
आर. एस. लॉस्टम













