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आषाढ़ सुखा निहारता श्रावण

आषाढ़ सुखा निहारता श्रावण
हाथ मलता रह गया,
आषाढ़ मास प्यासा चला गया है,

आज जमीं खेतों को पानी नहीं है, किसान फिर पानी की आस में ही छला गया है।

जून जुलाई स्तब्ध रह गए भीषण गर्मी से, हर जीवन यहां
जल सा गया है

प्रकृति से खिलवाड़ जो किया तो समझना श्रावण मास भी सुखा हि जाएगा रे ।

वो कागज किस्सा था, आज कस्ती वाली कहानी बनकर चला गया।।

त्रासदी में ताल तलैया आंसू बहाते यहां पे,
सूनी-सूनी रेतीली नदियां सिसकती हुई दिखाई देती यहां पे।

हर तरफ जमीन पर कब्जा दबंगई का जो हुआ है,

हर तरफ गायों का जीवन ख़तरे में पड़ा हुआ है।

ऐसी स्थिति है यहां दान चोरी करके ईश्वर को भी छला गया है

पानी जो शहीद होने से मिलने लगे तो, क्या ग़म है।

शर्म से आंखों का पानी काला नाला हों गया है

खेती को बढ़ावा फसलों से ही मिला है और फसलें सूखी है तालाब सुखे है, और तपती जमीं पर हम मनसूबों को उगाकर जीम्मैदारी को भुला कर बतियाते है ।
हम सब,
बरसात में भी प्यासें है,
आसमां झुलसा रहा है और तपन से आज
जमीं रो रही है,

जिसे आप धरती मां कहते हों, हर तरफ
उसी धरती मां पर मिसाइलें दागी जा रही हजारों,
और यहां लाखों बम उछाला गया है।।

पापीयों ने
करके छन्नी सीना जमीं का, धरती मां को घायल किया है

प्रदुषण मुक्त कहां है जमीं हरि भरी नहीं यहां पर,

हर बार लगाने से ज्यादा तुमने
पेड़ों को काट डाला गया है।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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