
जब हर दिशा में धुंध घनी हो,
जब पथ का हर दीप बुझा हो,
तब भी मन के मौन गगन में,
आशा का इक तारा जगा हो।
वह कहती है—
“मत हारो, अभी समय तुम्हारा है,
हर अँधेरी रात के पीछे,
उजले सवेरा का किनारा है।”
सूखी डालों पर भी देखो,
फिर से कोपल फूटती है,
टूटी साँसों की सरगम में,
नई ज़िंदगी भी छूटती है।
आशा कोई कल्पना नहीं,
यह संघर्षों की साथी है,
जो गिरकर फिर उठना सिखाए,
वह जीवन की सच्ची थाती है।
तूफ़ानों से डरने वालों को,
मंज़िल कहाँ नसीब हुई?
इतिहास उसी ने रचा जगत में,
जिसकी आशा कभी न क्षीण हुई।
इसलिए विश्वास जगाए रखो,
हर साँस में एक उजियारा है,
जब तक आशा जीवित है मन में,
तब तक जीवन भी तुम्हारा है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













