
नयन नहीं, दो दीप जले हैं,
संकोचों के पावन वन में।
जैसे सावन की प्रथम फुहारें,
उतरी हों शुष्क धरा के मन में।
यह मुख पर केवल वस्त्र नहीं है,
यह संस्कृति का उज्ज्वल मान है।
यह मर्यादा की मौन वंदना,
यह नारी का स्वाभिमान है।
यह लज्जा का दुर्बल बंधन नहीं,
यह आत्मगौरव का आलोक है।
जिसने इस मौन भाषा को पढ़ा,
उसके भीतर ही सच्चा लोक है।
पलकों पर ठहरी विनय की सरिता,
दृष्टि में मधुर सरल विश्वास।
अधरों से पहले बोल उठी है,
मन की निर्मल पावन प्यास।
चेहरे का सौंदर्य क्षणभंगुर है,
यौवन भी एक दिवस ढल जाएगा।
किन्तु शील, सदाचार और संयम,
युग-युग तक अमर कहलाएगा।
नयनों की भाषा शब्द न माँगे,
भाव स्वयं स्वर बन जाते हैं।
जहाँ मौन का संगीत बहे,
वहाँ हृदय स्वयं झुक जाते हैं।
जो केवल रूप निहार रहे हैं,
वे सत्य कहाँ पहचानेंगे।
आत्मा के निर्मल दर्पण को,
बाह्य आवरण क्या जानेंगे?
घूँघट हो या हो कोई परदा,
महिमा उसकी वस्त्र नहीं।
गरिमा, शील और सत्य जहाँ हों,
उससे बढ़कर अस्त्र नहीं।
जिस नारी के अंतर्मन में,
स्नेह, करुणा, धैर्य निवास करे।
उसके चरणों में झुककर ही,
सारा युग सम्मान धरे।
नयन अगर विनम्र बने हों,
वाणी मधुर, विचार महान।
ऐसे जीवन का प्रत्येक क्षण,
बन जाता है स्वयं पुराण।
मत खोजो आकर्षण केवल,
रूप-रंग की चंचल छाया में।
सच्चा सौंदर्य खिलता देखा,
चरित्र, करुणा और माया में।
सौंदर्य वह नहीं,
जो दर्पण में दिखाई दे;
सौंदर्य वह है,
जो किसी के हृदय में श्रद्धा जगा दे।
आभूषण तन को सुशोभित करते हैं,
किन्तु संस्कार आत्मा को।
वस्त्र शरीर को ढकते हैं,
किन्तु मर्यादा व्यक्तित्व को।
नयन यदि विनम्र हों,
वाणी यदि मधुर हो,
आचरण यदि पवित्र हो—
तो फिर किसी परिचय की आवश्यकता नहीं रहती।
याद रखिए—
रूप आकर्षित कर सकता है,
किन्तु चरित्र ही हृदय पर राज्य करता है।
और जो हृदय पर राज्य कर ले,
उसे समय भी पराजित नहीं कर सकता।
धर्मेंद्र कुमार राठौर
व्याख्याता भौतिक विज्ञान
झालावाड़ राजस्थान













