
आदरणीया —सार छंद
16,12 पदांत 22/1111/112/211
भींगे नयन अश्रु लिए फिरते, मन की पीर छुपाए।
टूटे सपनों की कुछ किरचें, पलकों बीच समाए॥
आशा के नव दीप जलाकर, राह नई अपनाएँ।
दुख की वह काली बदली भी,इक पल में छँट जाएँ।
भींगे नयन व्यथा कुछ पाएँ, केवल मौन विराजे।
मन की टूटी फिर वीणा भी, आशा-स्वर ही साजे॥
साहस लेकर बढ़ते रहना, जीवन रीति पुरानी।
भींगे नयन हँसी बन जाएँ, जीते हर नादानी॥
भींगे नयन प्रीत संजोए, यादें बनी सहारे।
टूटी डोरी फिर भी मन की, प्रेम-सुगंध पुकारे।
धैर्य धरे जो हर विपदा में, मंजिल वो तो पाए।
भींगे नयन एक दिन हँसकर, नव जीवन मुस्काए॥
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













