
जंतर-मंतर की धरती पर,
कल फिर एक सवाल खड़ा था,
हाथों में संविधान लिए,
हर छात्र मौन खड़ा था।
न कोई पत्थर, न कोई शोर,
बस आँखों में पीड़ा थी,
बरसों की तपस्या का मान,
आज जैसे अधूरी थी।
किससे कहें कि रात-रात भर,
दीपक बन जो जलते हैं,
माँ के अधूरे सपनों को,
आँखों में लेकर चलते हैं।
पिता पसीना बोते हैं,
बेटे-बेटियाँ सपने सींचते हैं,
पर जब मेहनत हार जाती,
तब विश्वास भी टूटते हैं।
रो पड़ी आज शिक्षा भी,
अपना चेहरा ढककर बोली—
“मैंने तो बस ज्ञान दिया था,
मुझ पर यह बदनामी क्यों ओढ़ी?”
कलम ने कागज़ से पूछा—
“क्या अब सच लिखना अपराध है?”
किताबें भी चुपचाप रो उठीं,
“क्या मेहनत होना ही व्यर्थ है?”
मत छीनो इन बच्चों से,
उनकी आँखों का उजियारा,
यही तो कल का भारत हैं,
यही देश का है सितारा।
न्याय मिले हर विद्यार्थी को,
यही समय की पुकार बने,
शिक्षा फिर से मंदिर बन जाए,
न किसी का व्यापार बने।
जिस दिन श्रम का सम्मान होगा,
सच का ऊँचा मान होगा,
उस दिन जंतर-मंतर नहीं,
हर विद्यालय मुस्कान होगा।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र











