
सपनों का टुटना,,
दर्द हो सिसकीयों में तो कविताएं छपवाऊं,,
आंखों को यह दिन देखने को मिलता है तो,
घर संसार सड़कों पर उतर आए तो,
कविताऐं छपवाऊं।।
थोड़ा भरोसा, थोड़ा विश्वास थोड़ा समय बर्बाद हो गया हो तो, मैं किस किस को बताऊं,,,
मेरे पिता की तलाश को, मेरी मां की आस को,भाई, बहिन की मुस्कान को,
बिच चोराहे पर कैसे दफ़नाऊं
अपने हाथों से हि अपने घर के सपने को
मैं आग कैसे लगाऊं,,
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)











