
एक व्यंग रचना
एक स्टूडेंट स्कूल को रोता हुआ जा रहा था,
मम्मी के हाथ में पानी की बोतल थी,
बस्ते का बोझ उसके वज़न से दुगना ढोता हुआ वो जा रहा था
मैंने कहा क्यों रोते हों स्कूल जाने में,
किस बात पर इतना रो रहे हो,
पढ़ने तो हम जाते थे,
मगर
स्कूल के बाहर ही सड़क पर गढ़े में पड़ जाते थे,
और रोते-रोते वापस घर लौट कर आ जाते थे।
और तुम जाते हुए रो रहे हो,
तुम्हारे स्कूल को जाने में, रोने में
और हमारे स्कूल के बाहर पड़ने में , रोने में
बहुत बड़ा फर्क है,,,
हम बचपन में रोए फिर नहीं रोए ,,
साहब,,
और
तुम जिंदगी भर पढ़ते हो, जिंदगी भर रोते हों,
कभी भीड़ में रोते हों, तो कभी अकेले में रोते हों,
तो कभी पढ़ाई करने वालों की भीड़ में
डंडे की मार खा कर रोते हों,,
हाथ पैर तो हमारे भी टूटते फुटते थे,
मगर स्कूल जाने से पहले।
हाथ पैर तुम्हारे भी टूटते फुटते हैं
मगर पुलिस की लाठीयों से मार खाने के बाद ।।
पहले रोते हुए को मनाने की परम्परा थी,
आज हमारा
रुलाने वाला कानून है
परम्परा है।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)











