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आस्था का महापर्व : जगन्नाथ रथयात्रा

आओ मिलकर गान करें, जय जग के नाथ की,
निकली आज रथयात्रा, महिमा अपरंपार की।

नीलाचल से निकले प्रभु, करुणा के अवतार,
बलभद्र, सुभद्रा संग चले, करने जग उद्धार।

घंटे, शंख, मृदंग की ध्वनि गूँजे चारों ओर,
“जय जगन्नाथ!” के जयघोष से गुंजित हुआ हर छोर।

स्वर्ण नहीं, रत्नों से बढ़कर भक्तों का विश्वास,
रथ की डोरी छूते ही खिल उठता हर श्वास।

राजा हो या साधारण जन, सब हैं एक समान,
प्रभु के सम्मुख मिट जाता हर पद और अभिमान।

रथ के पहिए कह रहे, चलते रहो निरंतर,
जीवन भी है एक यात्रा, प्रभु बनें पथप्रदर्शक अंतर।

महाप्रसाद की सुगंध में प्रेम और भक्ति का स्वाद,
हर कण में अनुभव होता प्रभु का दिव्य प्रसाद।

विशाल नयनों से प्रभु रखते जग का सारा ध्यान,
हर प्राणी पर बरसाते अपनी असीम कृपा महान।

जो श्रद्धा से नाम जपे, जो प्रेम से डोरी थाम,
उसके जीवन-पथ पर स्वयं साथ चलें भगवान।

हे जगन्नाथ! ऐसी कृपा हर हृदय में भर दो,
भेदभाव के तम को हरकर प्रेम का दीप धर दो।

करुणा, सेवा, समता का संदेश सदा फैलता रहे,
मानवता का पावन दीप हर हृदय में जलता रहे।

जय बलभद्र! जय सुभद्रा! जय जगन्नाथ भगवान!
रथयात्रा का यह महापर्व करे विश्व का कल्याण।

रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार

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