
एक कर्म होता है वो
जानबूझकर कर होता है जो
एक कर्म अनजाने में घटित होता है वो
पौराणिक इतिहास व धर्मशास्त्र कहता है जो
किसी आत्मा को सताता है जो
पीड़ित निरीह-आत्मा अगर शापित कर दे
प्रायश्चित करने पर जन्म-जन्मांतर दंडित होता है वो
दशरथ ने अनजाने में
श्रवण के मात-पिता को जो अक्षम्य दी जो पीडा
प्रायश्चित करने पर भी
कम न हुई शाप जनित मनोरंजन की आखेटक क्रीड़ा।
एक जानबूझकर कर स्वार्थ वशीभूत हो किया महापाप
इस का न कोई प्रायश्चित
जन्म-जन्म झेले वो संताप
शक्ति संपन्न करते हैं —
अपनी करनी पर प्रायः करें वे अट्ठास
किसी काल में कम नही होगा ताप
सनातनी ही नहीं, हर धर्म में झेलें वे दोजख की आग।
पाप कर्म हो… असहाय से पाएं शाप
समय निकल जाने पर करनी अपनी पर
उन की आत्मा चाहे कितना भी करे विलाप
अपने अहं में थे जब दिन रात
भूल गए मृत्युलोक है ये … भवसागर में डूब मरे वो
हर जन्म आश्रय विहीन होकर…कीट सम जलें वो ताप।
ऐसा कोई कर्म घटित न हो…प्रायश्चित हो मिले बस राख।
महेश शर्मा, करनाल









