
सवालों पर पहरा
लाठी से सत्य झुकता नहीं, ये बात पुरानी है,
सत्ता की हर गलियारे में आवाज लगानी है।
वे बच्चे थे, हथियार नहीं, बस अपने सपने लाए थे,
आँखों में उजले कल के कुछ दीपक जगमगाए थे।
पर उत्तर में पहरे मिले, बैरिकेडों की छाया थी,
लोकतंत्र की चौखट पर क्यों ऐसी कठोर काया थी?
उन नन्हें हाथों में केवल प्रश्नों की तख्ती थी,
न्याय माँगने की मन में केवल सच्ची भक्ति थी।
लेकिन जिनको सुनना था, वे सुनकर भी मौन रहे,
पीड़ा के सारे शब्द वहाँ पत्थर बनकर गौण रहे।
इतिहास गवाह है, हर युग में प्रश्न उभारे बच्चों ने,
सत्य-अग्नि के दीप जलाए कोमल से कंधों ने।
आवाज़ों को दबा दोगे, पर विचार कब मरते हैं,
सच्चाई के बीज सदा चट्टानों में भी उगते हैं।
मत समझो डर जाएगा भविष्य तुम्हारी ताकत से,
न्याय नहीं रुक सकता केवल कुर्सी की हिफाज़त से।
जो अपने अधिकारों हेतु सड़कों पर आ जाते हैं,
वे आने वाले कल की नई इबारत लिख सकते हैं।
दिल्ली की उन राहों का हर दृश्य सवाल उठाता है,
लोकतंत्र के माथे पर एक दाग-सा बन जाता है।
बच्चों पर कठोरता करके कोई महान नहीं होता,
सत्ता का सम्मान वहीं, जहाँ हृदय खड़ा होता।
हर घायल सपना एक दिवस हिसाब माँगने आएगा,
हर आँसू जनमन में बनकर सैलाब नया फिर लाएगा।
सिंहासन क्षणभंगुर होते, जनता अमर कहानी है,
बच्चों की आवाज़ दबाना सबसे बड़ी नादानी है।
कल इतिहास यही लिखेगा, किसने सत्य छिपाया था,
युवाओं की पीड़ा को लाठी के जोर से दबाया था।
समय की शिला पर’सुमन’काले अक्षरों में जड़ा जाएगा,
सवालों पर जब-जब पहरा होगा, जनसागर सैलाब लाएगा।













