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सूरज हुं मैं

सूरज हुं मैं ,
नहीं किसी मैं बुझने वाला ,

अब नहीं आएंगे जय हनुमान,
मुझे मुंह में अब कोई नहीं है खाने वाला,

तुम्हारी बचपन की आदतों को छौड़ो,
फुंक मार कर दीपकों को बुझाने की

सूरज हूं आंधियों से भी मैं नहीं बुझने वाला ,

इस दुनियां में पैदा नहीं हुआ है कोई सूरज को बुझाने वाला।

चांद तारों पर जाने वालों कान खोलकर सुन लो तुम,

एक सवाल खड़ा है हमेशा सामने तुम्हारे ,
यह सवाल तुम्हारे सामने हमेशा खड़ा हि रहेगा ।।

समय बहुत बलवान है यहां पर, कई आएं और आकर के चलें गये
कोई हमेशा के लिए नहीं टिकने वाला।।

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, मुट्ठी में है तकदीर हमारी,

हम खुद तकदीर लिखने वाले हैं
नहीं कोई हे यहां
हमारी तकदीर को लिखने वाला ।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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