दिल्ली की सड़कें गवाह हैं,
यहां किताबें नहीं, बैरिकेड बिकते हैं।
यहां डिग्री नहीं, तारीखें लटकती हैं।
और यहां भविष्य नहीं, सपने कुचले जाते हैं।
हम वो छात्र हैं…
जिनके बाप ने खेत बेचे,
माओं ने गहने गिरवी रखे।
सोचा था बेटा अफसर बनेगा।
आज बेटा सड़क पर “देशद्रोही” कहलाता है।
धर्मेंद्र प्रधान जी
पेपर लीक हुआ तो प्रेस कॉन्फ्रेंस।
बच्चे खुदकुशी करें तो जांच कमेटी।
भविष्य जला तो बयान।
शर्म बची हो तो कुर्सी छोड़ दीजिए।
क्योंकि कुर्सी सजाने के लिए नहीं,
जिम्मेदारी निभाने के लिए होती है।
नरेंद्र मोदी जी
आपने कहा था “मैं युवा हूं, युवा मेरा है”।
आज वही युवा लाठी खा रहा है।
रोजगार मांगा तो लाठीचार्ज मिला।
सवाल पूछा तो केस मिला।
अगर बोझ नहीं उठाया जाता,
तो सिंहासन खाली कर दीजिए।
ये भीड़ हुड़दंग के लिए नहीं आई।
ये भीड़ मजबूरी में आई है।
जब क्लास के दरवाजे बंद कर दोगे,
तो सड़क ही हमारी यूनिवर्सिटी बन जाएगी।
सुन लो दिल्ली, सुन लो सत्ता
अब चुप नहीं बैठेंगे।
अब झुकेंगे नहीं।
क्योंकि जब कलम टूट जाती है,
तो हाथ उठ जाते हैं।
और जब हाथ एक हो जाएं…
तो इस्तीफे खुद चलकर आते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













