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कविता

“कुछ व्यक्तित्व इतिहास नहीं, युगों की चेतना बन जाते हैं।
अमर क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद उन्हीं अमर विभूतियों में से एक हैं।”

“आज़ाद”—एक नाम नहीं, भारतीय आत्मा का अमर घोष

“स्वधर्मे निधनं श्रेयः।”
“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”

भारत की पुण्यभूमि ने अनेक वीरों को जन्म दिया, किंतु कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल इतिहास नहीं रचते, वे राष्ट्र की आत्मा बन जाते हैं। अमर क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद ऐसे ही युगपुरुष थे। वे केवल अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि भारतीय संस्कृति, स्वाभिमान, सत्यनिष्ठा और अदम्य चरित्र के साक्षात् प्रतीक थे।

जब भी उनके जीवन का स्मरण करती हूँ, मन श्रद्धा से भर उठता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो भारत की पावन धरा आज भी उनके चरणचिह्नों को अपने हृदय में संजोए हुए है और प्रत्येक पीढ़ी से कह रही है—
“यदि स्वाभिमान को समझना हो, तो आज़ाद को पढ़ो; यदि राष्ट्रप्रेम को जीना हो, तो आज़ाद को आत्मसात् करो।”

आज का समय बाहरी आकर्षण, क्षणिक प्रसिद्धि और दिखावे का है। किंतु चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके शील, सत्य, संयम और चरित्र में निहित होता है। उनका वह विचार—

“कोई गोरी हो या काली, अपना ईमान ख़राब मत करो।”

—मेरे लिए केवल एक कथन नहीं, बल्कि जीवन का दीपस्तंभ है। यह विचार बताता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण उसका रूप नहीं, उसका ईमान है; सबसे बड़ा वैभव धन नहीं, उसका स्वाभिमान है।

भारतीय संस्कृति भी यही कहती है—

“शीलं परमं भूषणम्।”
अर्थात् चरित्र ही मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण है।

शायद यही कारण है कि मेरा मन कभी बाहरी आकर्षण से प्रभावित नहीं हुआ। यदि किसी व्यक्तित्व ने मेरे अंतर्मन को स्पर्श किया है, तो वह चंद्रशेखर आज़ाद का तेजस्वी चरित्र है। यह किसी व्यक्ति के प्रति क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि उनके आदर्शों, उनके स्वाभिमान और उनके राष्ट्रप्रेम के प्रति मेरी गहन अकीदत है।

आज़ाद ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि राष्ट्रभक्ति केवल शब्दों का शृंगार नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन, साहस और आत्मबल का नाम है। उन्होंने अपने प्राणों की अंतिम साँस तक पराधीनता को स्वीकार नहीं किया। वे अपने नाम के अनुरूप अंतिम क्षण तक “आज़ाद” रहे।

आज जब मूल्य डगमगाते दिखाई देते हैं, तब आज़ाद का जीवन हमें फिर से स्मरण कराता है कि विचार अमर होते हैं और चरित्र इतिहास से भी अधिक दीर्घजीवी होता है।

मेरे लिए चंद्रशेखर आज़ाद केवल एक ऐतिहासिक नायक नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन हैं। उनका स्मरण मुझे यह विश्वास देता है कि यदि विचार शुद्ध हों, चरित्र अटल हो और राष्ट्र सर्वोपरि हो, तो मनुष्य मृत्यु के पश्चात भी युगों तक जीवित रहता है।

उनकी पुण्यतिथि पर मैं उन्हें अश्रुपूरित नेत्रों से नहीं, बल्कि उनके आदर्शों पर चलने के संकल्प के साथ नमन करती हूँ। यही उनके प्रति मेरी सच्ची श्रद्धांजलि है।

समर्पित पंक्तियाँ—

न हि ते म्रियन्ते, ये राष्ट्राय जीवनं समर्पयन्ति।
ते जनमानसेषु, इतिहासे च सदा अमराः भवन्ति।

(जो अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित करते हैं, वे कभी नहीं मरते; वे जनमानस और इतिहास में सदैव अमर रहते हैं।)

कोटि-कोटि प्रणाम, अमर क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद।
आपका तेज, आपका त्याग और आपका आदर्श युगों-युगों तक भारत की आत्मा को आलोकित करता रहेगा।

मेरे आदर्श के नाम…

न ताज की आरज़ू, न हुस्न की परस्तिश,
मेरी रूह का सज्दा बस आपके किरदार को है।

लोग इश्क़ की दास्तानें लिखते रहे,
मैंने अपनी अकीदत सिर्फ़ “आज़ाद” के नाम लिखी है।

जो लोग वक़्त के साथ भुला दिए जाते हैं, वे अफ़साने होते हैं,
जो सदियों तक ज़मीर में ज़िंदा रहें, उन्हें “आज़ाद” कहते हैं।

ख़िराज-ए-अक़ीदत।

लेखक –
श्री ठाकुर, देवघर (झारखंड)

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