
वो मखमली शाम,कठिन है मुझे भूल पाना
जहाँ,तुझ संग मिलने को होता था,रोज आना
तु भी कैसी बेताबी,करती थी मेरा इन्तेजार?
ढलती सूरज। की ओर ,देखती थी बार बार ।
याद है,मुझे वो दिन आज भी बहुत खूब से
उस स्थान मे, तु पहुँचती थी,छिप छिपकर सबसे,
वो मखमली शाम का वक्त,हमारे लिए ही था,
जो कि,हमदोनो को मिलने हेतु आना ही था ।
फिर वक्त बदला,लोग जानने लगे हमारे बारे मे,
प्रेम के दुश्मन निकलने लगे सारे,इस जमाने मे
खुशियो के पल को,सहना तो कठिन था,
ऊपर से साफ दिखने वाले लोग,दिल से मलिन था ।
और हुआ वही,जो हर प्रेम का होता है अंत,
हमदोनो के घर मे सूचना पहूचाई गई तुरंत,
हमारे मिलने मे, लगे ढेर सारी पाबंदी,
देख सबो की मंशा,रोक लिये प्रेम वाली जिंदगी।
चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड













