
पर नहीं बिका ‘विद्रोही’ – अंतिम प्रेस कॉपी
वो अखबार बिक गये,
वो कलम के सिपाही, वो पत्रकार बिक गये।
सच लिखने वाला कागज भी बाजार बिक गया,
स्याही का ईमान भी रिश्वतखोर के द्वार बिक गया।
कल तक जो विरोध में थे वो किरदार बिक गये,
अपने आपको पाक-साफ कहने वाले ईमानदार बिक गये।
वो नेता बिक गये, नेताओं के सरदार बिक गये,
वोट के सौदागर, कुर्सी के बाजार बिक गये।
हमारे गांव के बिक गये कहीं पंच,
और बिक गये चौक-चौराहे पर लगने वाले मंच।
वो थानेदार बिक गये, तहसीलदार बिक गये,
वो डि.एम और एस.डी.एम बिक गये,
इंसाफ की कुर्सी, कानून के रखवाले बिक गये।
झूठन खाने वाले दलाल ‘ठीक’ हो गये,
चंद कागज के टुकड़ों के खातिर भारत माँ के लाल बिक गये।
लेकिन कोई करिश्मा न कर पाया माई का लाल,
बिक गये किरदार, बिक गये उसूल, बिक गया सवाल।
बिक गये कहीं नेता असरदार,
हमारे गांव के पटेल, पटेलों के किरदार बिक गये।
लेकिन नहीं बिका एक कलमकार का जमीर,
वो आज भी कंगाल नहीं, बना वो अमीर।
नहीं बिकी ‘विद्रोही’ की बोली,
नहीं बिका खड़ावदा का ये हमजोली।
शहर-शहर श्मशान बन गये, गाँव-गाँव कब्रिस्तान,
पर नहीं मिला खड़ावदा को आज तक वो मान-सम्मान।
जिंदा लोगों के लिए सड़क नहीं, अस्पताल नहीं,
तो मरने के बाद खड़ावदा को मिला कहाँ श्मशान?
ये कैसा विकास है, ये कैसी सरकार है,
जहाँ जिंदा इंसान भटकता है, और मुर्दा लाचार है।
जब सब बिक गया, तो अब एक ही आस बाकी है,
कि ‘विद्रोही’ की कलम नहीं बिकी, उसकी आवाज बाकी है।
बम बम भोले! आदेश आदेश
कवि गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा
तह. गरोठ, जिला मंदसौर, मध्यप्रदेश, भारत देश
बिक गया सब कुछ… पर नहीं बिका ‘विद्रोही’
वो अखबार बिक गये,
वो कलम के सिपाही, वो पत्रकार बिक गये।
सच लिखने वाला कागज भी बाजार बिक गया,
स्याही का ईमान भी रिश्वतखोर के द्वार बिक गया।
कल तक जो विरोध में थे वो किरदार बिक गये,
अपने आपको पाक-साफ कहने वाले ईमानदार बिक गये।
वो नेता बिक गये, नेताओं के सरदार बिक गये,
वोट के सौदागर, कुर्सी के बाजार बिक गये।
हमारे गांव के बिक गये कहीं पंच,
और बिक गये चौक-चौराहे पर लगने वाले मंच।
वो थानेदार बिक गये, तहसीलदार बिक गये,
वो डि.एम और एस.डी.एम बिक गये,
इंसाफ की कुर्सी, कानून के रखवाले बिक गये।
झूठन खाने वाले दलाल ‘ठीक’ हो गये,
चंद कागज के टुकड़ों के खातिर भारत माँ के लाल बिक गये।
लेकिन कोई करिश्मा न कर पाया माई का लाल,
बिक गये किरदार, बिक गये उसूल, बिक गया सवाल।
बिक गये कहीं नेता असरदार,
हमारे गांव के पटेल, पटेलों के किरदार बिक गये।
लेकिन नहीं बिका एक कलमकार का जमीर,
वो आज भी कंगाल नहीं, बना वो अमीर।
नहीं बिकी ‘विद्रोही’ की बोली,
नहीं बिका खड़ावदा का ये हमजोली।
शहर-शहर श्मशान बन गये, गाँव-गाँव कब्रिस्तान,
पर नहीं मिला खड़ावदा को आज तक वो मान-सम्मान।
जिंदा लोगों के लिए सड़क नहीं, अस्पताल नहीं,
तो मरने के बाद खड़ावदा को मिला कहाँ श्मशान?
ये कैसा विकास है, ये कैसी सरकार है,
जहाँ जिंदा इंसान भटकता है, और मुर्दा लाचार है।
जब सब बिक गया, तो अब एक ही आस बाकी है,
कि ‘विद्रोही’ की कलम नहीं बिकी, उसकी आवाज बाकी है।
कवि गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा
तह. गरोठ, जिला मंदसौर, मध्यप्रदेश, भारत देश













