सबसे बड़ी गुलामी रोटी की नहीं।
सबसे बड़ी गुलामी ख्वाहिशों की है।
लोहे की बेड़ी टूट जाती है।
“लोग क्या कहेंगे” साथ चलती है।
मन कुछ और, जुबान कुछ और।
दिल रोता है, चेहरा हंसता है।
इसी को जीना कह दिया गया।
आंखें नींद मांगती हैं।
उंगलियां स्क्रीन मांगती हैं।
हजार चेहरे, अपना कोई नहीं।
स्टेटस पर “खुद से प्यार”।
हकीकत में खुद से दूर।
जो गया उसी की दहलीज।
जिसने तोड़ा उसी से आस।
कल को सीने से लगाए फिरें।
और पूछें आज भारी क्यों।
कल के पीछे भागते-भागते।
आज को भी गुलाम कर दिया।
सबसे काली रात वो है।
जब आईना सवाल करे।
जब ज़मीर कहे “रुक जा”।
और हम खामोश रह जाएं।
दुनिया के लिए सर ऊंचा।
खुद के लिए सर झुका।
सुनो…
आज़ाद वक्त का गुलाम नहीं।
आज़ाद सबका मोहताज नहीं।
आज़ाद खुद की पसंद से डरता नहीं।
आज़ाद गिरकर भी नहीं गिरता।
क्योंकि जंजीरें अंदर हैं।
और चाबी भी तुम्हारे पास।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













