
मही कहूँ तुम्हें या कहूँ शस्य-श्यामली,
तेरे आँचल में पलती, हर एक कोंपल हरियाली।
फसलों की लहरों में, जब तू इठलाती है,
लगता है धरती माँ, खुद गीत गुनगुनाती है।
काले-काले बादल जब, तेरे माथे को छूते हैं,
बीज-बीज में तेरे, अंकुर नए फूटते हैं।
गेहूँ की बालियों में, सोना सा दमकता है,
धान की हरियाली में, जीवन रस चमकता है।
तूने भूखे को रोटी, प्यासे को जल दिया,
बिना माँगे ही सबको, अपना आँचल भर दिया।
चरणों की धूलि तेरी, माथे पे लगाता हूँ,
तेरी गोद में पलकर, मैं भी इतराता हूँ।
पर आज तेरे तन पर, घाव नित्य बढ़ते हैं,
प्लास्टिक के काँटे, जहर के धब्बे सड़ते हैं।
हे शस्य-श्यामला माँ, तू फिर से मुस्का दे,
हर खेत, हर बगिया को, हरियाली से सजा दे।
वचन लेता हूँ माँ, अब तेरा मान रखूँगा,
एक पेड़ लगाऊँगा, नदियों को साफ रखूँगा।
आदित्य तू ही मही है, तू ही जीवन की थाल है,
तेरे बिना ये सृष्टि, बस एक वीरान जंगल है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













