
खुलकर हँस लेने से
दर्द कुछ हल्के हो जाते हैं,
और खुलकर रो लेने से वे लगभग समाप्त हो जाते हैं।
किन्तु जो व्यक्ति स्वयं की प्रकृति को समझ लेता है, वह जीवन को देखने का अपना दृष्टिकोण बदल लेता है। फिर पीड़ा उसे भयभीत नहीं करती, क्योंकि वह परिस्थितियों से भागता नहीं, उन्हें समझता है। समस्या को पहचानकर उसका समाधान खोजता है और उचित समय पर सही निर्णय लेने का साहस रखता है।
मनुष्य की सबसे बड़ी बाधा बाहरी नहीं, बल्कि उसका अपना मन है। यदि मन हमारे वश में न हो, तो बुद्धि कभी स्थिर नहीं हो सकती। अस्थिर मन भावनाओं के प्रवाह में बहकर ऐसे निर्णय ले लेता है, जिनका पश्चाताप जीवनभर करना पड़ सकता है।
विपरीत परिस्थितियाँ हमें तोड़ने नहीं, स्वयं को पहचानने का अवसर देती हैं। ऐसे समय में आवश्यक है कि हम स्वयं का आकलन करें, समय की दिशा को समझें और अपने निर्णयों का विवेकपूर्ण परीक्षण करें। क्योंकि जो व्यक्ति अपने मन को साध लेता है, वही अपनी बुद्धि को सही दिशा दे पाता है।
जब मन और बुद्धि में सामंजस्य स्थापित हो जाता है, तब निर्णयों के परिणाम का भय समाप्त हो जाता है। जीवन मुस्कान के साथ आगे बढ़ता है, सकारात्मकता हमारा स्वभाव बन जाती है और आत्मविश्वास हमारी सबसे बड़ी शक्ति।
अपने मन को अपना स्वामी नहीं, अपना साथी बनाइए—
जीवन स्वयं सरल और सुंदर प्रतीत होने लगेगा।
राधे-राधे!
जय श्री कृष्ण!
आशी प्रतिभा













