कफ़न सफेद है, मगर दाग सब उसके अंदर छुपे हुए हैं।
इन दागों को हजार बार धोने से भी साफ नहीं किया जा सकता।
क्योंकि ये खून के धब्बे नहीं हैं, जो मिट जाएं।
ये उन ज़ख्मों के निशान हैं, जो जीते जी दिए गए थे।
जीते जी उसी जिस्म की इज्जत के चीथड़े उड़ाए गए थे।
हर गली में, हर महफिल में उसका तमाशा बनाया गया था।
और आज, मरने के बाद, वही लोग दो गज कपड़ा ओढ़ा रहे हैं।
ये शर्म नहीं है, ये दुनिया को दिखाने का ढोंग है।
चार कंधे आज अर्थी को बड़े अदब से उठा रहे हैं।
मगर चालीस लोग ऐसे थे, जिन्होंने जीते जी पीठ में छुरा घोंपा था।
आज आंखों में आंसू लेकर मातम मना रहे हैं।
कल भीड़ बनकर खड़े होकर, उसका तमाशा देख रहे थे।
अर्थी को फूलों से सजाया गया है, और चारों तरफ खुशबू है।
लेकिन उसके रिश्ते कांटों से भरे हुए थे, जो आज भी चुभ रहे हैं।
जिन हाथों ने कभी सहारा नहीं दिया, आज वही माला पहना रहे हैं।
जिन आंखों ने कभी आंसू नहीं पोछे, आज वही नम हैं।
मौत ने आकर सबका हिसाब बराबर कर दिया है।
ताज भी उतर गया, और तख्त भी मिट्टी में मिल गया।
अमीर भी दो गज जमीन में, और गरीब भी दो गज जमीन में।
बस फर्क इतना है: एक के कफ़न पर इत्र और फोटो लगी है, दूसरे पर कर्ज और आंसू।
सबसे बड़ी कविता तो यही है, जो आज लिखी जा रही है।
जिसके दरवाजे पर जीते जी मदद के लिए दस्तक दी थी।
उसने कहा था, “भाई, अभी टाइम नहीं है, फिर आना।”
और आज वही लोग, कब्र पर घंटों खड़े होकर कह रहे हैं, #बड़ेअच्छेइंसान_थे।
पर अब वो सुन नहीं रहा, क्योंकि मिट्टी के नीचे आवाज नहीं जाती।
मरने के बाद इंसान से कोई शिकायत नहीं रहती, कोई बेईमानी नहीं रहती।
रिश्ते भी खत्म, गिले-शिकवे भी खत्म, हिसाब भी खत्म।
बस रह जाती है एक सफेद चादर, और कुछ झूठी तारीफें।
आखिरी लाइन:
कदर अगर करनी है, तो जिंदा रहते हुए कर लो।
कफ़न पर फूल चढ़ाने से, और कविता लिखने से।
टूटे हुए रिश्ते वापस नहीं आते,
और बुझे हुए चिराग दोबारा नहीं जलते।
सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचनाएँ।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













