
भोर सुहानी हो गई, खुले गगन के द्वार।
सिन्दूरी धरती हुई, प्रकृति करे श्रृंगार।।
उदयाचल पर हो उदित, डाल रहे सम दृष्टि।
ऊंँच-नीच मानें नहीं,करें सूर्य शुचि वृष्टि।।
सत्य बात कहना सदा, नहीं बोलना झूठ।
चाहे कोई खुश रहे,चाहे जाए रूठ।।
शुचि बातों का कर मनन, सुखद मिले परिणाम।
परेशान होता भले, बढ़े सत्य का दाम।।
जड़ चेतन हर जीव से, रखते सम व्यवहार।
सकल सृष्टि को सूर्य जी, देखें एक प्रकार।।
मन को जो है साधता, वह ज्ञानी विद्वान।
तपो निष्ठ शुचि साधना, कृपाकरें भगवान।।
करें दुखों का अन्त है, सुनते करुण पुकार।
सूर्य देव भगवान के,सुंदर सुखद विचार।।
दूर किए जग का तमस,बांँट रहे उपहार।
परोपकारी भाव है, करें सभी से प्यार।।
सूर्य देव की दृष्टि से,बचे नहीं इंसान।
शक्ति पुंज के धाम हैं, भक्त करें गुणगान।।
जगजीवन आसान हो,दूर सभी अवरोध।
नए-नए लेकर विषय, करिए सब जन शोध।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
रायबरेली उत्तर प्रदेश













