
न यह किसी चेहरे की हार है,
न किसी पद की जीत का मान।
यह तो समय की उस चौखट पर,
लिखा गया एक नया विधान।
कुर्सियाँ बदलती रहती हैं,
सत्ता का स्वर भी ढलता है।
पर छात्र की आँखों का सपना,
हर युग में सच ही पलता है।
जब प्रश्न उठें व्यवस्था पर,
उत्तर देना आवश्यक है।
जनमन के विश्वास बचाने,
परिवर्तन भी आवश्यक है।
शिक्षा केवल नौकरी भर नहीं,
राष्ट्रों का भविष्य गढ़ती है।
मेहनत की हर छोटी बूंद,
कल की गंगा बन बहती है।
यदि निर्णय जनहित में हो तो,
स्वागत उसका होना चाहिए।
पर हर शंका के समाधान का,
रास्ता भी खुलना चाहिए।
असली जीत तभी कहलाए,
जब न्याय सभी तक पहुँच सके।
हर परिश्रमी विद्यार्थी का,
सपना नभ को छूकर हँस सके।
आशा का दीप जले मन में,
विश्वास न फिर से टूटेगा।
सत्य, श्रम और समता के बल पर,
भारत विश्वगुरु बन लौटेगा।
पूर्णिमा सुमन













