
जब-जब अन्याय बढ़ जाता है,
जब सच का गला दबाया जाता है,
तब इतिहास के पन्नों पर,
एक युवा फिर जन्म उठाता है,
आँखों में सपनों की ज्वाला,
सीने में तूफ़ानों का शोर,
अन्यायों से टकराने निकला,
लेकर साहस की दृढ़ डोर,
वह पूछता है— कब तक झुककर जीना होगा?
कब तक मौन रहेंगे हम? कब तक मातृभूमि के सपनों पर, स्वार्थ लिखेंगे हरदम?
उधर खड़ा है एक सेनानी,
माथे पर त्याग का प्रकाश,
जिसने अपने रक्त से सींचा,
भारत का हर एक विश्वास,
वह सेनानी, जिसने बर्फ़ीली रातों में अपनी नींद गंवाई है, जिसने हर साँस भारत पर हँसते-हँसते लुटाई है,
उसकी वर्दी का हर धागा,
बलिदानों की कहानी है,
हर रक्त की हर बूंद कहती—
देश कभी झुकने न देना,
अपने आक्रोश को कभी, नफ़रत में ढलने न देना।”
युवा ने मुठ्ठी भींच के बोला—
अब अन्याय सहा न जाएगा,
मेहनत का अधिकार किसी से छीना न जाएगा।,
कलम भी मेरी तलवार बनेगी, सत्य मेरी पहचान बनेगा, यदि देश पुकारेगा मुझको, हर युवा सेनानी बनेगा,
युवा का आक्रोश यदि राष्ट्रधर्म से जुड़ जाए,
और सेनानी का त्याग हर हृदय में उतर जाए—
तो फिर कोई शक्ति भारत को झुका नहीं सकती,
यह मातृभूमि फिर से विश्वगुरु बनने से रुक नहीं सकती।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













