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दिल-ए-नादां


( एक गजल )

जिंदगी क्यूं ख़फ़ा हो गई
आ के जिंदगी के इस मोड़ पे
आओ फिर मिल के चलें
जिंदगी को जिंदगी से जोड़ के।

दिल-ए-नादां को नहीं मिला सबब
यूं भी जा सकती है ये जिंदगी
इन फिजाओं में न मिली ढूंढे से वो रवांनगी
ये शीशा-ए-दिल तोड़ के ।

गले मे बहियां का था हार मिला
कहां चले गए तुम
इन अंधियारी-सी रातों में
यूं बहियां मरोड़ के ।

जिंदगी क्यूं ख़फ़ा हो गई
आ के जिंदगी के इस मोड़ पे
आओ फिर मिल के चलें
जिंदगी को जिंदगी से जोड़ के।

जिस पे था नाज इतना
इतराते थे वफ़ा-ए- जिंदगी पे हम
यूं न जाते जिंदगी के इस मोड़ पे
कुछ तो कह देते
चाहे कह देते हमें झिंझोड़ के।

दर्द-ए-दिल बन गया अफसाना
इन सूनी राहों में
क्यूं चले गए यूं सर-ए-राह छोड़ के
इस उम्मीद में जी रहे
आओ गे फिर एक दिन बहोड़ के ।

जिंदगी क्यूं ख़फ़ा हो गई
आ के जिंदगी के इस मोड़ पे
आओ फिर मिल के चलें
जिंदगी को जिंदगी से जोड़ के ।

  महेश शर्मा,करनाल 

(थॉरोल्ड-नियाग्रा फॉल्स से )

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