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रहगुजर

तेरी रहगुजर से गुजरेंगे ना कभी मौसम के बहकजाने का आज भी डर है
मंजिले तो ठुकराई है यार ना जाने बिन तेरी रहनुमाई कितना दुरूह सफर है

आज भी तेरी अक्सियत दिल को बैचैन कर देती है
यादों की तेरी सरगोशियाँ मन को सुकून से भर देती है

दिल तोड़ा तूने मेरा फिर भी क्यूँ दिल को तेरा ही एतबार होता है गुज़रू जो तेरी रहगुजर से क्यों आज भी तेरा इंतज़ार होता है

तू नसीब थी मेरा जुनून था मेरा किसी और का रकीब बन गयी
क्या कहूँ ए मुराद तू मेरी थी किसी और की फरमाइश बन गयी

तेरी गलियाँ भी अंजानी सी वीरानी सी लगती है
बंजर वो आलिशान हवेली क्यूँ अब पुरानी सी लगती है

एक पूरा जहाँ उस पैबंद पर पुरजोर मुकम्मल था
जालों से महफूज़ कदीम एक तस्वीर पर बाबस्ता अमल था

दुस्वप्नों से सजी इस दुनियाँ मे कसम तेरा ख्याल भी एक रूहानी सुकून देता है
देखता जब जब तेरी तस्वीर को ए यार मेरे दूसरी दुनियाँ का अरमाँ आता है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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