
जीवन के हर पल से मिलती शिक्षा-
पर मिलते परिवारों से ही संस्कार ।
नन्हें मन को मिलती सीख सदा घर से ही,
दूसरों के प्रति कैसा हो उसका व्यवहार।
होता बड़ों का आदर और शिष्टाचार जिस घर में
बच्चे भी वही संस्कार अपनाते हैं।
घर हो या बाहर वह सदैव ही,
अपने से बड़ों के आदर में शीश झुकाते हैं।
परिवार संस्कारों की पहली पाठशाला,
अनुशासित रहना और सदाचरण सिखलाती है।
बांटती नैतिक मूल्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी,
सच्चे अर्थों में जीवन मूल्यों का पाठ पढ़ाती है।
अपने, पराये का भेद नहीं जानते बच्चे,
कोमल मन से सबको अपनाते हैं।
बचपन से मिले संस्कारों से वह,
भविष्य में समाज को सच्ची राह दिखाते हैं।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)













