
इंसान क्यों ढूंढता फिर रहा भगवान को
कभी मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में
पत्थर में भगवान को ढूंढ रहा है
इंसान क्यों नहीं समझता कि भगवान साक्षात उसी में समाए हुए हैं
भूखे को जो रोटी दे दे, प्यासे को पानी पिला दे, गरीब के बच्चे के हाथ में किताब थमा दे तो
अपने अंदर झांक कर देख लो
तो भगवान को पाओगे
मूर्ति के सामने शीश झुकाते,
प्रसाद का भोग लगाते
और वहीं भूखे -प्यासे को
दीन ,असहाय को देख कर मुंह मोड़
लेता है
तो ईश्वर कहां से दिखेंगे
पत्थर को भोग लगाते हो ,पर जीव को ठुकराते हो
जब इंसान को रुलाओगे तो भगवान कैसे खुश होंगे
रामायण ,गीता,कुरान, बाइबिल
सबका सार बतलाता है
“सेवा ही सच्ची पूजा है”हर धर्म यही सिखलाता है
कण-कण में है भगवान ऐसा कहते हो
फिर भगवान क्यों नजर नहीं आते हैं
क्योंकि आंख में नफरत का चश्मा, दिल पर स्वार्थ का ताला लगा हुआ है
चश्मा को उतार दो ,ताला को खोल दो, इंसान को इंसान समझो
फिर देखोगे, तो हर चेहरे में, अपने में भी साक्षात भगवान दिखेंगे
“मोको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास”
भगवान तो तेरे आसपास दिखेंगे इसे मानना ही पड़ेगा
डॉ मीना कुमारी परिहार











