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कविता

इस दुनियां में रह कर भी तुम किस दुनिया में होते हो,

जहां कोई नहीं अपना पराया,
भ्रम कि दुनिया में क्यों रहते हो ,

कुछ पाने कि लालच में आकर तुम सारा जीवन दाव पर लगा दिया करते हो।

अपना सर्वत्र दाव पर खेल कर सब कुछ अपना खो देते हो।

एक बार लत लग जाए बूरी आदतों की तो समझ लीजिए कि जिंदगी भर रोते हुए रहते हो,

ऋण लेने से बचें हम लोग, वरना सूत खोर , पूरा का पूरा घर लूट लिया करते हैं।

ऋणी होता दरिद्रता में जिंदगी भर ,
ब्याज में दबा हुआ होता है,

क्यों क़र्ज़ बढ़ा कर रोज़ रोज़ घुट घुट कर मरते हो।

क्यों सूत खोर के झांसें में आ जाते हो
अपने घर परिवार को गर्द धकेल दिया करते हैं, ओर फिर रोते हो।

ना अच्छा खाते हैं,ना अच्छा पहनते हैं,
मां बाप को लड़ाई में शामिल करते हो,
बच्चों को नहीं पढ़ाते लिखाते हो,
उनका जीवन भी अंधकार में करते हो,

रिश्वत लेना और देना बिमारी है,
ब्याज लेना और देना महामारी है,
यह आदतें तीन पीढ़ियों को दुखी कर देते हैं,
इन सभी से बचोगे तो हि तुम,
परिवार का भरण पोषण कर सकते हो।

अशोक कुमार सुमन भवानी मंडी (राज.)

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