
राह जो काबिल बहुत है ।
राह वो मुश्किल बहुत है।
वो नहीं भाती किसी को,
बात जो बोझिल बहुत है।
रख नहीं पाई वो क़ीमत,
चीज़ जो हासिल बहुत है।
वो सभी के मुँह लगी है,
जो जहाँ दाख़िल बहुत है।
चूक जाती है निशाना,
आँख जो क़ातिल बहुत है।
बोलती है लड़खड़ाकर,
जीभ जो ग़ाफ़िल बहुत है।
नवीन माथुर पंचोली













