
मित्र तो केवल और केवल मित्र होता है,सच्चा मित्र या झूठा मित्र क्या होता है?
मित्र नाम है अहसास का
मित्र नाम है रिश्ते का
मित्र नाम है खुशबू का
मित्र नाम है प्यार का
मित्र नाम है ख़ुशी का
दरअसल हमने मित्र को एक दायरे में बांध दिया
कि मित्र बस तभी मित्र है जब वो काम आये यानी कि स्वार्थ से परिभाषित कर दिया गया
मित्र क्या तभी मित्र है जब वो वक़्त बे वक़्त काम आए?
शायद नहीं
क्योंकि मित्रता में स्वार्थ का कोई स्थान ही नही हो सकता
भाई ना हो तो मित्र ही भाई बन जाता है
संकट में जिसकी सबसे पहले याद आये वो मित्र होता है
रिश्तेदार भी याद आते हैं पर भरोसा सबसे ज्यादा मित्र पर ही होता है
मित्र तो हरपल अहसास है भाई होने का
बहन होने का
माँ होने का
बाप होने का
क्योंकि मित्र हर उस रिश्ते की कमी को पूरा करता है जो किसी के जीवन मे उसका वजूद ना हो।












