
कल मेरा एक दोस्त मेरे सपनो मे आया
मिलते ही पूरे जोश से वो गले मुझे लगाया
मेने उस दोस्त के बाहों मे सारी दुनिया का अपनापन जैसे पाया
लगा जैसे प्रेम ही प्रेम का एक संसार मेरे हिस्से पाया
वो क्या मिला दो जख का दर्द मेरे जहन से कहीं खो गया
तन्हा जीवन की असहनीय वेदना का जैसे अंत हो गया
साथ ऐसा था विरह का सितम अब गंवारा ना था
आंखों मे अश्कों के दूर ओर कोई नज़ारा ना था
बचपन का वो यार मेरा सबसे प्यारा था
वक़त की आंधी से ओझल वो यार हमारा था
सपने मे ही एक दुनिया सारी जी ली थी
अब हसरतें हकीकत की दुनिया की कुछ बाकी भी ना थी
वो सुबह हमारी गज़ब रंगीन थी
उस अपनेपन की एक मीठी कसक जहन-ओ-हसीं थी।
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












