Uncategorized
Trending

आशियां

अपनी धरा से चल के
हम आ गए कहां
जिंदगी कहे मिले जिंदगी में
जीने को आशियां…. जीने को आशियां ।

जहां में खुशियों के पल बीते वहां
जहां तक फैली है मौसम की ये फिज़ां
मन ये कहे
क्यूं जी रहे अपने जिंदगी यूं तन्हां
मौसम की इन फिजाओं में
हे जिंदगी ढूंढे तुम्हें हम कहां।

अपनी धरा से चल के
हम आ गए कहां
जिंदगी कहे मिले जिंदगी में
जीने को आशियां… जीने को आशियां।

मिलती है नसीब से
ऐसी‌ ये फिजां
सब छोड़ के चला आया तूं यहां
और अब ….हे मुसाफिर तूं जाएगा कहां
माना तूं अकेला नहीं है वहां… तेरा वहां बसा एक जहां
चार दिन तो जी ले … ये फिजा और समां
किस्मत में लिखा नहीं सभी के
जी ले ये जहां।

अपनी धरा से चल के
हम आ गए कहां
जिंदगी कहे मिले जिंदगी में
जीने को आशियां….. जीने को आशियां।

हम आ गए दुनिया को लांघ कर … इस जहां
जिंदगी के इस मोड़ पर
रब ने लिखा था ये जहां ।

दूर-दूर तक कुदरत का नूर-ए-सबाह यहां
जिंदगी को अगर जिंदगी मिले
बदा तेरे नसीब… कहते हैं जिसे नूर-ए-फिजा जहां।

अपनी धरा से चल के
हम आ गए कहा
जिंदगी कहे मिले जिंदगी में
जीने को आशियांं…. जीने को आशियां।

हम जैसे लोग ढूंढ रहे
रब के इस जहां…. दिन-रात खुद में खुद को ढूंढ रहे
कब लिखी है–
सुकून-ए-जिंदगी रब के इस जहां
मिले न जिंदगी… नूर-ए-चश्म बिन…जो मिली इस जहां
उम्र के इस मोड़ पर….चाहे रहे वो कहां।

अपनी धरा से चल के
हम आ गए कहां
जिंदगी कहे मिले जिंदगी में
जीने को आशियां…. जीने को आशियां।

                              महेश शर्मा, करनाल 

(थॉरोल्ड-नियाग्रा फॉल्स -से )

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *