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फसलों में मौसम बदला है

कविता

फसलों में मौसम बदला है ,

हरियाली में सुखा पन है,

खेत सारे
सुखे – सुखे

पले पड़ गये पात सारे,

मौसम में बढ़ती तपन है।

जो खेत हरियाली से महकते नजर आ रहे थे कभी,

पानी तपीस में
तर बतर,बदन है।

बीज छोड़ कर जाने की तैयारी में है,

बीज से चले,
बीज तक सिमट गई है, फसलें,,,

यहि सफर है यहां नस्लों का भी,
और
फसलों का भी,

न जाने
आने वाला कल कैसा रहेगा,

अब आने वाली नस्लों की बारी है,

सिर्फ राख हो गया है आदमी
दौड़ में,

जो बोलता था , हर तरफ
बक बक, बक बक। ?

बेबाक बातचीत में बिताया है निरस जीवन ,

जीवन सरल सहज और सुंदर बनाते हैं वो,

आदमी को आदमी प्यार करते हैं जो ,

सदैव प्यार निभानें की कोशिश करते हैं तो ।

कहां और आगे जाने की तैयारी हैं।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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